क्या हो रहा है वायरल : सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि इटली के वैज्ञानिकों ने अपनी नई रिसर्च में पाया है कि कोविड-19 जैसा कोई वायरस असल में है ही नहीं।
और सच क्या है ?
1200 शब्दों के इस मैसेज को तीन दावों में बांटकर हमने पड़ताल शुरू की।
- दावा 1
WHO का कानून कोविड-19 से मरने वालों के शरीर का पोस्टमॉर्टम करने की अनुमति नहीं देता। लेकिन, इटली ने इस कानून को तोड़कर लाशों का पोस्टमॉर्टम किया। और पाया कि कोविड-19 एक वायरस नहीं बैक्टीरिया है।
सच : WHO की वेबसाइट पर हमें ऐसे किसी नियम का उल्लेख नहीं मिला। जो कोविड-19 से संक्रमित मरीज की लाश का पोस्टमॉर्टम या किसी भी तरह की रिसर्च करने से रोकता हो।
WHO के स्पोक्सपर्सन दैनिक भास्कर को ई-मेल पर दिए एक जवाब में पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि - हम किसी भी देश पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकते।

- दावा 2
कोविड-19 नाम का कोई वायरस अस्तित्व में है ही नहीं ये एक ग्लोबल घोटाला है। लोग कोरोना वायरस से नहीं बल्कि ''5G इलैक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन ज़हर" के कारण मर रहे हैं।
सच : WHO हर सप्ताह एक सिचुएशन रिपोर्ट जारी करता है। इसमें कोविड-19 से संक्रमित मरीजों की संख्या और इससे होने वाली मौतों के आंकड़े होते हैं। ये आंकड़े सदस्य देश ही संगठन को उपलब्ध कराते हैं। 6 सितंबर की रिपोर्ट में इटली में पिछले सात दिनों में कोविड-19 के 9,485 नए केस बताए गए हैं।

जाहिर है जब इटली खुद कोविड-19 के नए मामलों के बारे में दुनिया को बता रहा है, तो वह मानता है कि कोविड-19 एक वायरस है।
- दावा 3
इटली के वैज्ञानिकों ने पाया कि कोरोना वायरस का इलाज एंटीबायोटिक्स से हो सकता है।
सच: रायटर्स की खबर के अनुसार, 24 अगस्त को इटली ने कोविड-19 वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल शुरू कर दिया है। अगर वहां कोविड-19 का इलाज एंटीबायोटिक्स से हो रहा होता तो इटली वैक्सीन का परीक्षण नहीं करता।

- इन सबसे स्पष्ट है कि वायरल मैसेज में किए जा रहे तीनों दावे मनगढ़ंत और फेक हैं। मैसेज में कुछ साइंटिफिक शब्दों का इस्तेमाल करके इस तरह फ्रेम किया गया है कि लोग इसे सच मानकर शेयर करें।
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